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| From : Ravi Singh at 05:31 PM - Nov 29, 2010 ( ) |
Share it on Facebookकाश हम पगडंडियाँ होते
यों न होते
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HAPPY BAISAKHI.BAHUT SHERO SHAYARI HO GAI VEER JI. NOW, PLS REMEBER GURU GOVIND SINGH ND HIS DEEDS. PLS DO WRITE CHOPAI SAHIB PATH HEE BESIDES THESE BORING POETS.
अधूरी ज़िन्दगी महसूस होती है
मुझे तेरी कमी महसूस होती है
मुझे देखा, मुझे सोचा, मुझे भूले
मुझे ये बात भी महसूस होती है
हमेशा साथ रहने की क़सम खाई
क़सम तेरी बड़ी भी महसूस होती है
बदन तेरा है उसमें जान मेरी है
तुझे क्या ये कभी महसूस होती है
उसको बहुत दिन से नहीं देखा
इन आँखों में नमी महसूस होती है
अजीब दर्द लिए फिर रहा हूँ प्यार में मैं
किसी को छोड़ के आया हूँ इंतज़ार में मैं
ग़रीबी ख़ुद ही परीशान होके कहने लगी
पड़ी रहूँगी भला कब तलक बिहार में मैं
मैं तो काँटा हूँ बहारोँ से मुझे क्या मतलब
कभी खिला ही नहीँ आज तक बहार में मैं
हर तरफ मज़हबी नफ़रत है, सियायत है यहाँ
जिऊँ तो कैसे जिऊँ अब तेरे संसार में मैं
अगर मैं धूप के सौदागरों से डर जाता
तो अपनी बर्फ़ उठाकर बता किधर जाता
पकड़ के छोड़ दिया मैंने एक जुगनू को
मैं उससे खेलता रहता तो वो बिखर जाता
मुझे यक़ीन था कि चोर लौट आएगा
फटी क़मीज़ मेरी ले वो किधर जाता
अगर मैं उसको बता कि मैं हूँ शीशे का
मेरा रक़ीब मुझे चूर-चूर कर जाता
तमाम रात भिखारी भटकता फिरता रहा
जो होता उसका कोई घर तो वो भी घर जाता
तमाम उम्र बनाई हैं तूने बन्दूकें
अगर खिलौने बनाता तो कुछ सँवर जाता.
tittle is in english, poet is in hindi, i can't understand your thoughts!
अँधेरे चारों तरफ़ सायं-सायं करने लगे
चिराग़ हाथ उठाकर दुआएँ करने लगे
तरक़्क़ी कर गए बीमारियों के सौदागर
ये सब मरीज़ हैं जो अब दवाएँ करने लगे
लहूलोहान पड़ा था ज़मीं पे इक सूरज
परिन्दे अपने परों से हवाएँ करने लगे
ज़मीं पे आ गए आँखों से टूट कर आँसू
बुरी ख़बर है फ़रिश्ते ख़ताएँ करने लगे
झुलस रहे हैं यहाँ छाँव बाँटने वाले
वो धूप है कि शजर इलतिजाएँ करने लगे
अजीब रंग था मजलिस का, ख़ूब महफ़िल थी
सफ़ेद पोश उठे काएँ-काएँ करने लगे
Kya baat hai Ravi bhai,A fresh new poet in Mudraa Family ,keep sending ..
Dilip Nilekar
Mumbai
हाथ में लेकर खड़ा है बर्फ़ की वो सिल्लियाँ
धूप की बस्ती में उसकी हैं यही उपलब्धियाँ
आसमा की झोपड़ी में एक बूढ़ा माहताब
पढ़ रहा होगा अँधेरे की पुरानी चिट्ठियाँ
फूल ने तितली से इकदिन बात की थी प्यारकी
मालियों ने नोंच दीं उस फूल की सब पत्तियाँ
मैं अंगूठी भेंट में जिस शख़्स को देने गया
उसके हाथों की सभी टूटी हुई थी उँगलियाँ
घोटाले करने की शायद दिल्ली को बीमारी है
रपट लिखाने मत जाना तुम ये धंधा सरकारी है ।
तुमको पत्थर मारेंगे सब रुसवा तुम हो जाओगे
मुझसे मिलने मत आओ मुझपे फतवा जारी है ।
हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई आपस में सब भाई हैँ
इस चक्कर मेँ मत पड़िएगा ये दावा अख़बारी है ।
भारतवासी कुछ दिन से रूखी रोटी खाते हैँ
पानी पीकर जीते हैं मँहगी सब तरकारी है ।
जीना है तो झूठ भी बोलो घुमा-फिरा कर बात करो
केवल सच्ची बातें करना बहुत बड़ी बीमारी है ।
अब तो करलो बुद्धि मित्र ठिकाने पर
मुंबई भी रक्खी हैं आज निशाने पर
सौ-सौ लोगों को खोकर भी खामोशी
कब टूटेगी सिंघासन की बेहोशी
अंधे लालच का सिन्धु भरके चित में
ध्रतराष्ट्र हैं मौन स्वयं-सूत के हित में
वरना वो खुनी पंजे तुड़वा देते
अब तक अफजल पे कुत्ते छुड़वा देते
जो ये कहते हैं भारत के रक्षक हैं
वो ही अफजल जैसों के संरक्षक हैं
बेशक सरे भारत का सर झुक जाये
उनकी कोशिश हैं ये फंसी रुक जाये
निर्णय लेना होगा अब सरकारों को
पहले फांसी होगी इन गद्दारों को
एक बार फिर दहते स्वर में इन्कलाब गाना होगा
फांसी का तख्ता जेलों से संसद तक लाना होगा. ![]()
है दुनिया जिस का नाम मियाँ ये और तरह की बस्ती है
जो महँगों को तो महँगी है और सस्तों को ये सस्ती है
याँ हरदम झगड़े उठते हैं, हर आन अदालत कस्ती है
गर मस्त करे तो मस्ती है और पस्त करे तो पस्ती है
कुछ देर नही अंधेर नहीं, इंसाफ़ और अद्ल पर्स्ती है
इस हाथ करो उस हाथ मिले, याँ सौदा दस्त-बदस्ती है
जो और किसी का मान रखे, तो उसको भी अरमान मिले
जो पान खिलावे पान मिले, जो रोटी दे तो नान मिले
नुक़सान करे नुक़सान मिले, एहसान करे एहसान मिले
जो जैसा जिस के साथ करे, फिर वैसा उसको आन मिले
कुछ देर नही अंधेर नहीं, इंसाफ़ और अद्ल परस्ती है
इस हाथ करो उस हाथ मिले, याँ सौदा दस्त-बदस्ती है
जो और किसी की जाँ बख़्शे तो तो उसको भी हक़ जान रखे
जो और किसी की आन रखे तो, उसकी भी हक़ आन रखे
जो याँ कारहने वाला है, ये दिल में अपने जान रखे
ये चरत-फिरत का नक़शा है, इस नक़शे को पहचान रखे
कुछ देर नही अंधेर नहीं, इंसाफ़ और अद्ल परस्ती है
इस हाथ करो उस हाथ मिले, याँ सौदा दस्त-बद्स्ती है
जो पार उतारे औरों को, उसकी भी पार उतरनी है
जो ग़र्क़ करे फिर उसको भी, डुबकूं-डुबकूं करनी है
शम्शीर तीर बन्दूक़ सिना और नश्तर तीर नहरनी है
याँ जैसी जैसी करनी है, फिर वैसी वैसी भरनी है
कुछ देर नही अंधेर नहीं, इंसाफ़ और अद्ल परस्ती है
इस हाथ करो उस हाथ मिले, याँ सौदा दस्त-बद्स्ती है
जो ऊँचा ऊपर बोल करे तो उसका बोल भी बाला है
और दे पटके तो उसको भी, कोई और पटकने वाला है
बेज़ुल्म ख़ता जिस ज़ालिम ने मज़लूम ज़िबह करडाला है
उस ज़ालिम के भी लूहू का फिर बहता नद्दी नाला है
कुछ देर नही अंधेर नहीं, इंसाफ़ और अद्ल परस्ती है
इस हाथ करो उस हाथ मिले, याँ सौदा दस्त-बद्स्ती है
जो और किसी को नाहक़ में कोई झूटी बात लगाता है
और कोई ग़रीब और बेचारा नाहक़ में लुट जाता है
वो आप भी लूटा जाता है औए लाठी-पाठी खाता है
जो जैसा जैसा करता है, वो वौसा वैसा पाता है
कुछ देर नहीं अंधेर नहीं, इंसाफ़ और अद्ल परस्ती है
इस हाथ करो उस हाथ मिले, याँ सौदा दस्त-बदस्ती है
है खटका उसके हाथ लगा, जो और किसी को दे खटका
और ग़ैब से झटका खाता है, जो और किसी को दे झटका
चीरे के बीच में चीरा है, और टपके बीच जो है टपका
क्या कहिए और ‘नज़ीर’ आगे, है रोज़ तमाशा झटपट का
कुछ देर नहीं अंधेर नहीं, इंसाफ़ और अद्ल परस्ती है
इस हाथ करो उस हाथ मिले, याँ सौदा दस्त-बदस्ती है
आँख से दूर न हो दिल से उतर जायेगा
वक़्त का क्या है गुज़रता है गुज़र जायेगा
इतना मानूस न हो ख़िल्वत-ए-ग़म से अपनी
तू कभी ख़ुद को भी देखेगा तो डर जायेगा
तुम सर-ए-राह-ए-वफ़ा देखते रह जाओगे
और वो बाम-ए-रफ़ाक़त से उतर जायेगा
ज़िन्दगी तेरी अता है तो ये जानेवाला
तेरी बख़्शीश तेरी दहलीज़ पे धर जायेगा
डूबते डूबते कश्ती तो ओछाला दे दूँ
मैं नहीं कोई तो साहिल पे उतर जायेगा
तुम जानना चाहती थी न !
कि-मेरी क्या हो तुम?
तो सुनो-
मुझमे समाहित प्रेम का,कोमल एहसास हो तुम.
मेरी प्रेरणा,मेरा विश्वास,मेरा आधार हो तुम.
मेरी प्राण,मेरी आत्मा,मेरा दिलो-दिमाग हो तुम.
मेरे वक्तित्व का प्रारूप,मेरी पहचान हो तुम.
मेरी नस-नस मेरी रग-रग कि जान हो तुम.
तुम क्या नही हो,
ये मै बता नहीं सकती?
रिश्तों के उपमान ,
तुम पर लगा नही सकती,
क्योंकि आज हर रिश्ते पर ,
कोई न कोई दाग लग चूका है,
संबंधो कि सीमाओं पर वासनामय आग लग चूका है.
सारे जज्बात झुलस रहे है,
अल्फाज बिखर रहे है.
सभी जलते हुए हृदय से ,
एक-दुसरे के अन्दर के सैलाब निरख रहे है.
कुछ तो स्वाहा होकर,रख में तब्दील हो चुके है.
कुछ जो बच गये है ,वे
प्लास्टिक सर्जरी कि तरह,
ख़ुशी कि चादर लपेट,
अपने हृद के घावों को छुपा,
अन्य लिपटे लिबास वालो को,
खुश करने कि कोशिश में लगे है.
सभी एक-दुसरे को खुश रखने के लिए खुश है,
पर मै जानती हु कि-अंदर से वे कितने दुखी है.
क्या ऐसा करने से वे एक-दुसरे को खुश रख पाएंगे...?
शायद नहीं??????
क्योंकि वे शहद की एक ऐसी खाली शीशी की तरह है
जो बाहर से पूरी भरी दिखाई पडती है ,
पर अंदर से रिक्त हो चुकी है.
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